आज से शुरू हो रही कावड़ यात्रा, भोलेनाथ को चढ़ेगा जल, पढ़िये पूरी खबर
भगवान शिव का पवित्र सावन मास आज से शुरू हो गया है। जहां भक्त जमकर इस मास में भगवान भोलेनाथ की भक्ति करते है। वहीं, इन सबसे बीच देश में आई कोरोना महामारी के चलते वर्ष 2020 से कावड़ यात्रा पर रोक लगी हुई थी। वहीं, इस बार आज से कावड़ यात्रा शूरू होने जा रहे है। जहां आज से कावड़ लेकर लोग भगवान भोलेनाथ को जल चढ़ाने के लिए पहुंचेगे। बता दें कि यह तीर्थयात्रा श्रावण के पहले दिन शुरू होती है और श्रावण शिवरात्रि तिथि 26 जुलाई को समाप्त होगी।
यहां से भरते है जल
जानकारी के लिए बता दें कि कांवड़ एक बांस का खंभा होता है। जिसके दोनों ओर रस्सी से लटके दो घड़े होते हैं। कांवरिया कांवड़ को अपने कंधे पर ले जाते हैं और गंगा के पवित्र जल को इकट्ठा करने के लिए यात्रा शुरू करते हैं। कांवड़िया इस बर्तन को भरने के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश, गौमुख, गंगोत्री, काशी, सुल्तानगंज आदि स्थानों की यात्रा शुरू करते हैं। देवघर के बाबाधाम में सावन के पूरे एक महीने श्रावणी मेला लगता है। दिलचस्प बात यह है कि कावड़ों को चार प्रकारों समझा जा सकता है। आइये जानते है कावड़ के नियम।
- बैठी- बैठी कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़िया कांवड़ को जमीन पर रख सकता है।
- डाक- डाक कांवड़िया को कांवड़ के साथ दौड़ना पड़ता है, वे रूक नहीं सकते।
- खड़ीः खाड़ी कांवड़िया न तो कांवड को लटका सकते हैं और न ही उसे फर्श पर रख सकते हैं। जब वह आराम कर रहे हों तो उसे किसी और को इसे पकड़ने के लिए कहना पड़ता है।
- झूलाः झूला कांवड़िया अपने कांवड़ को लटका सकते हैं, लेकिन उसे जमीन पर नहीं रख सकते। कांवड़िया कांवड़ को धारण करते हुए व्रत रखते हैं और नंगे पैर चलते हैं।
जपते है ये मंत्र
वहीं, कावड़िये जब तक भोले बाबा को गंगा जल न अर्पित कर दें अनाज, पानी और नमक का सेवन सख्त वर्जित रहता है। कांवड़िया एक दूसरे का नाम भोले रखते हैं और अपने महादेव का नाम जपते रहते हैं। जिन्हें प्यार से भोलेनाथ कहा जाता है। कांवड़ यात्रा में पूरे रास्ते बम-बम भोले जपते रहते है।
जल्द होती है मनोकामना पूर्ण
आपको बता दें कि भोले नाथ कांवड़ से गंगाजल चढ़ाने से सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं। इसके पीछे यह मान्यता भी है कि जब समुद्रमंथन के बाद 14 रत्नों में विष भी निकला था और भोलेनाथ ने उस विष का पान करके दुनिया की रक्षा की थी। विषपान करने से उनका कंठ नीला पड़ गया और कहते हैं इसी विष के प्रकोप को कम करने के लिए, उसे ठंडा करने के लिए शिवलिंग पर जलाभिषेक किया जाता है और इस जलाभिषेक से शिव प्रसन्न होकर आपकी मनोकामनाएं जल्द ही पूरी करते है।

